मृत्य भोज
रविवार, 2 नवंबर 2025
मौत का मंगल उत्सव - मृत्युभोज एवं गंगा प्रसादी
-: मौत का मंगल उत्सव :-
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
मृत्यु-भोज (नुक्ता-मोसर-गंगाप्रसादी) कानूनी शिकन्जे में
हिन्दू-धर्म व समाज व्यवस्था के अनेक संस्कार व मान्यताये अपराध बन गये :- हजारों वर्षों के धार्मिक अंधी आस्था व वर्ण व्यवस्था के काले युग में जन्मी-पनपी अनेक मान्यताएं, परम्पराएं व धार्मिक अनुष्ठान वर्तमान वैज्ञानिक व सामाजिक राजनैतिक स्वतंत्रता के युग में अपराधों की श्रेणी में आ चुके है । इस देश की संसद व विधान सभाओं में इन आपराधिक मान्यताओं, परम्पराओं के लिए दाण्डिक कानून बनाये है जैसे :-
(1). महाभारत कालीन जुआं खेलने जैसे प्रचलन को रोकने के लिऐ :
''सार्वजनिक जुआं अधिनियम सन् 1867'', ''राजस्थान जुआं अध्यादेश सन् 1949''
(2). गुरूड़-पुराण की नारी-बलि (पति की लाश के साथा जिन्दा जलना) जैसी व्यवस्था को रोकने के लिए :
''सती प्रथा निवारण अधिनियम 1987''
(3). वैदिक यज्ञों में एवं देवी-देवताओं को प्रसन्न करने हेतु धर्म के नाम पर मूक पशु-पक्षियों की बलि जैसे कत्लेआम को रोकने के लिए :
(4). छोटी उम्र में लड़के-लड़कियों की शादी कर बालकों के शोषण को रोकने हेतु :
(5). सोलह-सोलह हजार रानिया रखने एवं पांच-पांच पति रखने जैसे बहुपत्नीक व बहुपति रखने की प्रथा को रोकने के लिए :
(6). देवतओं एवं महर्षियों द्वारा रम्भा, मैनका, उर्वसी, तिलोत्तमा जैसी अपस्राओं के साथ रति किया करना व 'नियोग' से सन्ताने उत्पन्न करने जेसे व्यभिचार को रोकने हेतु वैश्यावृति निषेध अधिनियम (पीटा एक्ट) सन् 1956 एवं नारी का अशिष्ट प्ररूपण निषेध अधिनियम सन् 1986 बनाया गया ।
(7). वर्ण व्यवस्था से पनपी जाति-पांती भेदभाव मिटाने व जातीय आधार पर होने वाले अत्याचारों को अपराध करार देने हेतु 'नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 एवं अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1990 बनाया गया । इन अपराधों की सख्त सजाऐ है ।
(8). साधनहीन गरीबों को बंधुवा मजदूर रखकर बैगार लेने जैसे अपराधों को रोकने हेतु ''बन्धुवा मजदूर मुक्ति अधिनियम 1976'' बनाया गया ।
(9). जागरण, रात्री-जागरण, भजन-मंडली, प्रार्थनाओं से होने वाले शोरगुल व हंगामों से ध्वनि-प्रदूषण होता है एवं लोगों की शान्ति भंग होती है । इसको रोकने के लिए 'शोरगुल नियंत्रण अधिनियम 1963'' बनाया गया । उच्चतम न्यायालय ने धर्म के नाम पर होने वाले ध्वनि-प्रदूषण को अधार्मिक करार दिया है ।
(10). मृत्यु-भोज, नुकता, मौसर, गंगा-प्रसादी भी इनमे एक है । मृतक की आत्मा के लिए स्वर्ग व मोक्ष की कल्पना करके श्रमजीवी-वर्ग अपनी कड़ी मेहनत की कमाई को इस कर्मकाण्ड में बर्बाद करके कंगाल होता रहा है । इस आपराधिक कृत्य को रोकने के लिए सरकार ने ''मृत्यु-भोज निषेध अधिनियम 1960'' पारित कर मृत्यु-भोज आयोजकों व उनके सहयोगियों को दण्डित करने का प्रावधान किया गया है ।
अत: कोई कर्मकाण्ड धार्मिक कल्याणीकारी है या पतनकारी हमको समझना पड़ेगा ।
हिन्दुओं के 16 संस्कार जन्म से मरण तक लिपटे हुए है । महर्षि परासर गौभिल, शौनक, आश्यलायन के ग्रंथ गृहसुत्रों में, महर्षि-गौतम मनु की स्मृतियों में गरूड़-पुराण सतपथ ब्राह्मणग्रंथ व अन्य सेकड़ों ग्रंथों में 16 संस्कारों की प्रतिस्थापना की गयी । 16 संस्कार निम्न है :-
1. गर्भ संस्कार 2. पुंसवन संस्कार 3. सीमन्मांन्न्यन संस्कार 4. जात कर्म संस्कार 5. पुंसवन नामकरण संस्कार 6. निष्क्रमण संस्कार 7. अन्नप्रसान संस्कार 8. मुंडन संस्कार 9. कण भेद संस्कार 10. उपनयन (जनेऊ) संस्कार 11. वेदारम्भ संस्कार 12. विवाह संस्कार 13. गृहस्थाश्रम संस्कार 14. वानप्रस्थ संस्कार 15. सन्यास संस्कार 16. अन्तिम संस्कार (इसी में नुकता, मौसर-गंगाप्रसादी शामिल है ) शुद्रों को इन संस्कारों में से न. 10, 11, 14, 15 संस्कारों से वंचित रखा गया है जिससे इस वर्ग के लोग शिक्षित-दीक्षित होकर उच्चवर्ण योग्य बन सके । मृत्यु-भोज अंतिम संस्कार है वर्तमान सामाजिक न्याय व समानता की स्थिति नये संविधान के कारण पनपने लगी हैं इनमें धर्मगुरूओं या जगद्गुरूओं का योगदान नहीं है बल्कि ये तो नये संविधान को बदलने के कुत्सित अनुष्ठान कर रहे है जिन्होंने राजनिति का चौगा पहन रखा है ।
मोक्ष-स्वर्ग की कल्पनाओं ने पिंडदान, गौदान, श्राद्ध व मृत्युभौज के कर्मकाण्डों को जन्म दिया हैं । इन कर्मकाण्डों व संस्कारों के मकड़जाल में इस देश का सामान्य जनमानस जन्म से मृत्यु तक फसा रहता है । अपने खून पसीने की जीवन भर की कमाई गवा देता है ।
गंगा जो संसार की सबसे प्रदुषित नदी है जिसका पानी गंदा व जहरीला है उसमें मृतकों की हड्डिया डालने व स्नान करने में भोले-भाले श्रमजीवी माक्ष स्वर्ग के भुलावे की कल्पना करते है । घर आकर गंगाप्रसादी के नाम पर मृत्युभोज करके कंगाल बन जाते है । स्वार्थी व पाखंडी पंडों ने गंगा नदी को पापमोचनी घोषित कर रखा है और इस अवो आस्था से पेटपालन करते है । भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष प्रो. ए.के. शर्मा ने 1981 में कहा था ''गंगा नदी विश्व की सबसे ज्यादा दुषित नदी है ।'' प्रसिद्ध वैज्ञानिक वी.डी. त्रिपाठी ने लिखा है कि ''इलाहाबाद वाराणसी के घाटों पर 30 हजार लोशें हर वर्ष लाई जाती है । इसमें 15 हजार टन लकड़िया जलती है जिसकी तीन हजार टन राख तथा 150 टन अधजली लाशों की हड्डियां-मांस गंगा में प्रवाहित होते हैं । बनारस मं गंगा सबसे गंदी है वहां 100 मि.ली. पानी में 50,000 कालीफार्म कीड़े पाये जाते हैं । फिर भी भोले-भाले करोड़ों अंधविश्वासी गंगा जल को पवित्र मानते हैं ।
मृत्यु-भोज की कानून में परिभाषा :-
मृत्यु-भोज करने व उसमें शामिल होना अपराध है :-
मृत्यु-भोज करने व कराने वाले की सजा व दण्ड :-
मृत्यु-भोज पर कोर्ट से स्टे लिया जा सकता है :-
कोर्ट स्टे का पालन न करने पर सजा :-
सूचना न देने वाले पंच-सरपंच-पटवारी को भी सजा :-
मृत्यु-भोज में धन या सामान देने वाला रकम वसूलने का अधिकार नहीं है :-
इस देश का जन सामान्य, भोले-भाले, अनपढ़, रूढ़ीवादी धर्मभीरू श्रमजीवी वर्ग के लोग स्वर्ग-मोक्ष के अंधविश्वासी कर्मकाण्डों में सस्कारों में जीवन भर फंसे रहते है । ये संस्कार, कर्मकाण्ड इनके काले-भालू रूपी कम्बल की भांति लिपट गये है जो छोडना चाहने पर भी नहीं छूटते है है बल्कि गरीबों-कंगाली व बर्बादी के गर्त में डूबों रहे हैं ।
भोले-भाले बेसमझ लोग उसे काला कम्बल समझकर प्राप्त करने के लिए (जैसे मोक्ष प्राप्ति के लालच में ) तेज बहाव वाली नदी में कूद पड़े । तैरते हुए उस काले कम्बल को पकड़ लिया । डूबता हुआ काला भालू अपनी जान बचाने के लिए उस बेसमझ लोगों से लिपट गया व पंजों में जकड़ लिया । उन्होंने छूटकारा पाने की बहुत कोशिश की परन्तु भालू ने उनकी जोरदार जकड़ लिया । वे लोग भी भालू के साथ-साथ नदीं में बहने व डूबने लग गये ।
पानी के किनारे खड़े बुद्धिमान व समझदार लोगों ने जोर-जोर से आवाजें दी अरे ! भाईयों काले कम्बल के लालच (मोक्ष के लालच) को छोड़ दो अपनी जान बचाकर बाहर आ जावों । डूबहते-बते ना समझो ने पुकारा, अरे ! भाईयों हम तो इस काले कम्बल (कर्मकाण्डों के संस्कारों) से छुटकारा पाना चाहते है छोड़ना चाहते है परन्तु यह तो हमारे लिपट गया है, हमें जकड़ लिया है । छोड़ता ही नहीं है । अब तो हमें भी काले कम्बल के साथ बहना व डूबना पड़ रहा है हम तैर कर किनारे नहीं आ सकते ।
यहीं हालत इस समाज व्यवस्था के श्रमजीतियों, भोले-भाले धर्मभीरूओं की हो चुकी है । परम्पराऐं कर्मकाण्ड, रूढीवादी संस्कार इनके लिपटे हुऐ है । काले-भालू रूपी काले कम्बल की भांति, आत्मा के उद्धार, मोक्ष की प्राप्ति स्वर्ग-नर्क के भूलावों की लालसा इनके लिपट चुकी है न छुटती न छुटने देती है । इनको सदियों से पतन के गर्त में डूबा रही है व डूबाकर रहेगी यह काला-भालू रूपी कम्बल की संस्कृति व सभ्यता । करोड़ों विचार शुन्य, तर्कहीन, लोग इन कर्मकाण्डों व अन्धविश्वासों के चंगूल में फंस गये है व फंसे हुऐ है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण व वैज्ञानिक जीवन शैली अपनाने से कतराते है क्योंकि इनकी मानसिकता अंधविश्वासों से बन्धकर प्रतिबद्ध हो गयी है । केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण व वैज्ञानिक जीवन शैली ही अब पतन के कारणों से छुटकारा दिला सकती है अन्यथा इसका पतन के गर्त में डूबना सुनिश्चित है ।
स्वयं अपने स्वामी आप बनो ! (अत्त: नाथो भव:) - भगवान बुद्ध !

मृत्यु भोज : यह सच जानकर चौंक जाएंगे आप, जरूर पढ़े
बरगवां निवासी पं. स्व. एचपी तिवारी की पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि गरुण पुराण के अनुसार परिचितों और रिश्तेदारों को मृतक के घर पर अनाज, रितु फल, वस्त्र व अन्य सामग्री लेकर जाना चाहिए। यही सामग्री सबके साथ बैठकर ग्रहण की जाती थी। बीमारियों के कीटाणु असर न करें इसलिए किसी तरह का बघार लाना वर्जित था। उबला हुआ या फिर कंडे पर महज सादा भोजन बनाया व परोसा जाता था।
पं. स्व. श्री तिवारी के पुस्तक के अनुसार ब्राम्हण वर्ग उस समय अधिक शिक्षित होता था। वह औषधीय हवन के साथ वेदोच्चार की तरंगों के घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करता था। हवन उपचार के लिए इन्हें सदैव बुलाया जाता रहे, इसलिए इनके भोजन की व्यवस्था रख दी गई। तेरहवीं पर केवल गायत्री का जाप करने वाले यानी विद्वान और तपस्पी ब्राम्हणों को ही खिलाने का विधान है। ब्राम्हण कच्ची सामग्री यानी सीधा लेकर अपना भोजन खुद बनाते थे। महापात्र को दान के समय परिजनों को यह बताया जाता है कि हर व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है। परिजन शोक में पड़कर कोई आत्मघाती कदम न उठाएं इसलिए महापात्र के माध्यम से एक लोकाचार निभाकर उसे जीवन की सच्चाई की सीख दी जाती थी।
मृत्युभोज भी कोई भोज होता है?
एक किसान जिंदगी भर खेतों में काम करता है। खेती सबको पता है कि अब नफा कम नुकसान ज्यादा करती है लेकिन विकल्प के अभाव में हाड़तोड़ मेहनत करके गृहस्थी का बोझ उठाने का अनवरत प्रयास चलता रहता है। लेकिन जब इसी सूखे बदन व चेहरे पर झुर्रियां लिए किसान के ऊपर ब्राह्मणवाद टूट पड़े तो क्या हाल होता होगा। इसके परिवार का मैं खुद कई परिवारों की दुर्गति का मूकदर्शक ग्वाह रहा हूँ। कब तक इस तरह बर्बाद होते परिवारों को चुपचाप देखता रहूँ? कुछ तो लूट की सीमा हो। कुछ तो मानवता की मर्यादाएं हो। कुछ तो पंचों में इंसानियत का अंश जिंदा मिले बूढ़े किसान की मौत पर सब इस तरह खाने को टूट पड़ते है जैसे उनके जीवन का अंतिम खाना यही हो। फिर कभी मिलेगा ही नहीं इंसान की गिरावट को देखकर गिद्ध विलुप्त हो गए हमारे क्षेत्र से एक दूसरे की झूठन चाटने की इंसानी कला को देखकर कुत्ते भी आने बंद हो गए लेकिन इंसान है कि गिरना बंद करता ही नहीं।
कोई इंसान मर जाये,उसके बच्चे अनाथ से हो जाते है, उसकी विधवा गला फाड़-फाड़कर रो रही होती है। इन कर्कश-क्रंदन रोने की चीखों के बीच बैठकर इंसान मिठाईयां खा कैसे लेता है? कुछ तो इंसान कहने के लिए संवेदनाओं के टुकड़े खुद के अंदर बचा लो। सिर मुंडाएं, आंखों में आंसुओ का सैलाब लिए झूठी थालियों को लिए घूम रहे बच्चों पर तरस खा लो। क्यों झूठी शान के लिए इन परिवारों को बर्बाद किये जा रहे हो? जो समाज के पंच लोग है, जो इस मृत्युभोज रूप नरकासुर प्रथा का समर्थन करते है असल मे ये लोग इंसानी जामे में भूखे भेड़िए है। सभ्य समाज मे ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। किसी जानवर की मौत पर उस प्रजाति के बाकी जानवर मुंह लटकाकर भूखे बैठे रहते है लेकिन ये लोग अर्थी आंगन में पड़ी रहती है और बारह दिनों के भोजन का हिसाब लगाने बैठ जाते है। कुछ तो शर्म करो! इंसान होकर इंसानियत भूल गए तो जानवरों से ही कुछ सीख लो!
एक मृत्युभोज में लगभग 10 युवा अमलिडे पैदा कर दिए जाते है। ये नशेड़ी ही आगे मृत्युभोज के वाहक-समर्थक बनकर घूमते है। एक मौत पर लगभग 15 दिनों तक इनके लिए नशे का इंतजाम हो जाता है। न कमाने की नियत, न अपने बच्चों के होते है, न अपने परिवार के होते है और यह नशेड़ियों का झुंड दूसरों के परिवारों को बर्बाद करते जाता है और झुंड में नित नए सदस्य भर्ती करते जाते है। डोडा-पोस्त के नशे की लत ऐसी होती है कि पैसे के इंतजाम व कमाई का जरिया इनके लिए कोई मायने नहीं रखता। नशेड़ी घर मे बैठे बूढ़े बाप के मरने का भी इंतजार करता है ताकि 15 दिनों तक नशे का इंतजाम हो जाये चाहे उसके लिए बाप द्वारा सँजोई जमीन को ही क्यों न बेचना पड़े। गांव के गांव खाने व नशे के लिए उमड़ पड़ते है। "ओढावनी-पहरावणी" के नाम पर कपड़ों का इंतजार करते-रहते है। सारे रिश्तेदार बनियों की दुकानों पर लुटते फिरते है। खुद नशेड़ी लोग सिर मुंडाकर इस उम्मीद में बैठे रहते है कि ससुराल वाले ओढावनी के नाम पर मदद कर जाए। एक तरह से यह लालची व भूखे-नंगे लोगों का जमघट होता है। एक मौत पर मानवता का नंगा नाच होता है जिसे मृत्युभोज के नाम पर पुण्य का काम बताकर आयोजन किया जाता है। यह ईशानी पाप का चरम है जिसे पारलौकिक कल्पनाओं से रचित जलसा बताकर किया जाता है।
मानवता के इस ख़ौफ़नाक मंजर से जितना जल्दी हो मुक्ति ले लेनी चाहिए। सिर्फ मृत व्यक्ति के बेटे-बेटियों व बहुओं के अलावे किसी के लिए कोई कपड़ा लाने की रश्म अदायगी न की जाए। सिर्फ मृत व्यक्ति के परिवार वालों व उनके खास रिश्तेदारों के अलावे कोई इस आयोजन का भागीदार न बने। नशे के उपयोग पर पूर्ण पाबंदी हो। कोई रिश्तेदार भी मृत व्यक्ति के घर खाना न खाए। जो रिश्तेदार भौतिक रूप से दूर से आया हो उसके लिए खाने का इंतजाम पडौसी भाई करे। बारह दिनों के नाम पर जो इंसानियत को खोखली करने की रश्म है उसे घटाकर 3-5 दिन के बीच सीमित किया जाए। जो खास रिश्तेदार है उनको एक नियत दिन एक साथ आने को कह दें। सिर मुंडाएं बच्चों की गांव से लेकर हरिद्वार तक की बस-रेलों में चल रही अस्थि-विसर्जन यात्राओं पर रोक लगाई जाएं। ये पाखंड की उड़ाने भरने से हर हाल में बचा जाना चाहिए।
जो पैसा बुढ़ापे में इस डर से इलाज पर खर्च नहीं किया जाता कि अगर मर गया तो मृत्युभोज का इंतजाम कैसे होगा। वो पैसा इलाज पर खर्च होगा। बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होगा। काम-धंधों में निवेश होगा तो घरों में खुशहाली आएगी। परिवारों की बर्बादी का आलम खुशहाली में तब्दिल हो जाएगा। अब इस तरह की तस्वीरें आगे नजर नहीं आनी चाहिए। ऐसे सामाजिक कलंक के धब्बों की धुलाई कर लिजिए। ये दाग बहुत बुरे हैं...
परमेश्वर माली
मृत्यु भोज पर एक लघु लेख
पहनने लायक नहीं।
बाप एक का मरा ओर
पगड़ी पुरै परिवार ने पहन ली
बर्बादी का ऐसा नंगा नाच,
जिस समाज में चल रहा हो,
वहाँ पर पूँजी कहाँ बचेगी?
बच्चे कैसे पढ़ेगे?
बिमारों का इलाज कैसे होगा?
यह मुर्ग़ी पहले आई या अंडा पहले आया वाला नाटक बंद करो। यह समस्या कभी नहीं सुलझेगी! अब आप बुला लो, फिर वे बुलायेंगे। फिर कुछ और लोग जोड़ दो। इनसानियत पहले से ही इस कृत्य पर शर्मिंदा है, अब और मत करो। किसी व्यक्ति के मरने पर उसके घर पर जाकर भोजन करना ही इंसानी बेईमानी की पराकाष्ठा है और अब इतनी पढ़ाई-लिखाई के बाद तो यह चीज प्रत्येक समझदार व्यक्ति को मान लेनी चाहिए। गाँव और कस्बों में गिद्धों की तरह मृत व्यक्तियों के घरों में मिठाईयों पर टूट पड़ते लोगों की तस्वीरें अब दिखाई नहीं देनी चाहिए। इस कुरीति को मिटाने का एक ही उपाय है कि आओ आप और हम ये शपथ ले की हम इस प्रकार के आयोजनों में भोजन नहीं करेंगे धन्यवाद...
मौत का मंगल उत्सव - मृत्युभोज एवं गंगा प्रसादी
-: मौत का मंगल उत्सव :- *मृत्युभोज एवं गंगा प्रसादी* कुरितियों एंव रूढिवादी परम्पराओं के अधीन होना कायरता हैं ओर विरोध करना पुरू...
-
-: मौत का मंगल उत्सव :- *मृत्युभोज एवं गंगा प्रसादी* कुरितियों एंव रूढिवादी परम्पराओं के अधीन होना कायरता हैं ओर विरोध करना पुरू...
-
मृत्यु भोज : यह सच जानकर चौंक जाएंगे आप, जरूर पढ़ें मृत्युभोज का मुद्दा पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। फेसबुक और ...
-
मृत्यु-भोज (नुक्ता-मोसर-गंगाप्रसादी) कानूनी शिकन्जे में हिन्दू-धर्म व समाज व्यवस्था के अनेक संस्कार व मान्यताये अपराध बन गये :...